॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.4.1
अथ चतुर्थोऽध्यायः
सतीका अग्निप्रवेश
मैत्रेय उवाच
एतावदुक्त्वा विरराम शंकरः
पत्न्यंगनाशं ह्युभयत्र चिन्तयन्।
सुहृद्दिदृक्षुः परिशङ्किता भवा-
न्निष्क्रामती निर्विशती द्विधाऽऽस सा॥ १
etāvaduktvā virarāma śaṃkaraḥ
patnyaṃganāśaṃ hyubhayatra cintayan|
suhṛddidṛkṣuḥ pariśaṅkitā bhavā-
nniṣkrāmatī nirviśatī dvidhā''sa sā|| 1
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इतना कहकर भगवान् शंकर मौन हो गये। उन्होंने देखा कि दक्षके यहाँ जाने देने अथवा जानेसे रोकने—दोनों ही अवस्थाओंमें सतीके प्राणत्यागकी सम्भावना है। इधर, सतीजी भी कभी बन्धुजनोंको देखने जानेकी इच्छासे बाहर आतीं और कभी ‘भगवान् शंकर रुष्ट न हो जायँ, इस शंकासे फिर लौट जातीं। इस प्रकार कोई एक बात निश्चित न कर सकनेके कारण वे दुविधामें पड़ गयीं—चंचल हो गयीं॥ १॥