॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.5.14
केचिद्बभञ्जुः प्राग्वंशं पत्नीशालां तथापरे।
सद आग्नीध्रशालां च तद्विहारं महानसम्॥ १४
kecidbabhañjuḥ prāgvaṃśaṃ patnīśālāṃ tathāpare|
sada āgnīdhraśālāṃ ca tadvihāraṃ mahānasam|| 14
अर्थ
उनमेंसे किन्हींने प्राग्वंश (यज्ञशालाके पूर्व और पश्चिमके खंभोंके बीचमें आड़े रखे हुए डंडे) को तोड़ डाला, किन्हींने यज्ञशालाके पश्चिमकी ओर स्थित पत्नीशालाको नष्ट कर दिया, किन्हींने यज्ञशालाके सामनेका सभामण्डप और मण्डपके आगे उत्तरकी ओर स्थित आग्नीध्रशालाको तोड़ दिया, किन्हींने यजमानगृह और पाकशालाको तहस-नहस कर डाला॥ १४॥