श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.5.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

क्रुद्धः सुदष्टोष्ठपुटः स धूर्जटि-

र्जटां तडिद्वह्निसटोग्ररोचिषम्।

उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थितो हसन्

गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥ २

kruddhaḥ sudaṣṭoṣṭhapuṭaḥ sa dhūrjaṭi-

rjaṭāṃ taḍidvahnisaṭograrociṣam|

utkṛtya rudraḥ sahasotthito hasan

gambhīranādo visasarja tāṃ bhuvi|| 2

अर्थ

उन्होंने उग्र रूप धारण कर क्रोधके मारे होठ चबाते हुए अपनी एक जटा उखाड़ ली—जो बिजली और आगकी लपटके समान दीप्त हो रही थी—और सहसा खड़े होकर बड़े गम्भीर अट्टहासके साथ उसे पृथ्वीपर पटक दिया॥ २॥✎ 1317

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1317 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नर-मुण्डोंकी → नरमुण्डोंकी

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें