इसी प्रकार शंकरजीके चारों ओर जो महर्षियोंसहित अन्यान्य सिद्धगण बैठे थे, उन्होंने भी ब्रह्माजीको प्रणाम किया। सबके नमस्कार कर चुकनेपर ब्रह्माजीने चन्द्रमौलि भगवान्से, जो अबतक प्रणामकी मुद्रामें ही खड़े थे, हँसते हुए कहा॥ ४१॥✎ 35913191320
तथापरे सिद्धगणा महर्षिभि-
र्ये वै समन्तादनु नीललोहितम्।
नमस्कृतः प्राह शशाङ्कशेखरं
कृतप्रणामं प्रहसन्निवात्मभूः॥ ४१
इसी प्रकार शंकरजीके चारों ओर जो महर्षियोंसहित अन्यान्य सिद्धगण बैठे थे, उन्होंने भी ब्रह्माजीको प्रणाम किया। सबके नमस्कार कर चुकनेपर ब्रह्माजीने चन्द्रमौलि भगवान्से, जो अबतक प्रणामकी मुद्रामें ही खड़े थे, हँसते हुए कहा॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 432) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/6/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#359 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से, → भगवान्से,
#1319 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महर्षियों-सहित → महर्षियोंसहित
#1320 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वामना-वतारमें → वामनावतारमें