श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पृथग्धियः कर्मदृशो दुराशयाः

परोदयेनार्पितहृद्रुजोऽनिशम् ।

परान् दुरुक्तैर्वितुदन्त्यरुन्तुदा-

स्तान्मा वधीद्दैववधान् भवद्विधः॥ ४७

pṛthagdhiyaḥ karmadṛśo durāśayāḥ

parodayenārpitahṛdrujo'niśam |

parān duruktairvitudantyaruntudā-

stānmā vadhīddaivavadhān bhavadvidhaḥ|| 47

अर्थ

जो लोग भेदबुद्धि होनेके कारण कर्मोंमें ही आसक्त हैं, जिनकी नीयत अच्छी नहीं है, दूसरोंकी उन्‍नति देखकर जिनका चित्त रात-दिन कुढ़ा करता है और जो मर्मभेदी अज्ञानी अपने दुर्वचनोंसे दूसरोंका चित्त दुखाया करते हैं, आप-जैसे महापुरुषोंके लिये उन्हें भी मारना उचित नहीं है; क्योंकि वे बेचारे तो विधाताके ही मारे हुए हैं॥ ४७॥

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