श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.49

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

भवांस्तु पुंसः परमस्य मायया

दुरन्तयास्पृष्टमतिः समस्तदृक्।

तया हतात्मस्वनुकर्मचेत-

स्स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हसि प्रभो॥ ४९

bhavāṃstu puṃsaḥ paramasya māyayā

durantayāspṛṣṭamatiḥ samastadṛk|

tayā hatātmasvanukarmaceta-

ssvanugrahaṃ kartumihārhasi prabho|| 49

अर्थ

प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, परम पुरुष भगवान्‌की दुस्तर मायाने आपकी बुद्धिका स्पर्श भी नहीं किया है। अतः जिनका चित्त उसके वशीभूत होकर कर्ममार्गमें आसक्त हो रहा है, उनके द्वारा अपराध बन जाय, तो भी उनपर आपको कृपा ही करनी चाहिये॥ ४९॥✎ 360

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #360 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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