श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

जीवताद्यजमानोऽयं प्रपद्येताक्षिणी भगः।

भृगोः श्मश्रूणि रोहन्तु पूष्णो दन्ताश्‍च पूर्ववत्॥ ५१

jīvatādyajamāno'yaṃ prapadyetākṣiṇī bhagaḥ|

bhṛgoḥ śmaśrūṇi rohantu pūṣṇo dantāśca pūrvavat|| 51

अर्थ

प्रभो! ऐसा कीजिये, जिससे यजमान दक्ष फिर जी उठे, भगदेवताको नेत्र मिल जायँ, भृगुजीके दाढ़ी-मूँछ आ जायँ और पूषाके पहलेके ही समान दाँत निकल आयें॥ ५१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें