॥ श्रीहरिः ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
दक्षयज्ञकी पूर्ति
मैत्रेय उवाच
इत्यजेनानुनीतेन भवेन परितुष्यता।
अभ्यधायि महाबाहो प्रहस्य श्रूयतामिति॥ १
ityajenānunītena bhavena parituṣyatā|
abhyadhāyi mahābāho prahasya śrūyatāmiti|| 1
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महाबाहो विदुरजी! ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकरने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहा—सुनिये॥ १॥
इत्यजेनानुनीतेन भवेन परितुष्यता।
अभ्यधायि महाबाहो प्रहस्य श्रूयतामिति॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महाबाहो विदुरजी! ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् शंकरने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहा—सुनिये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 434) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/1/