श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

दक्ष उवाच

शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं

चिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम्।

तिष्ठंस्तयैव पुरुषत्वमुपेत्य तस्या-

मास्ते भवानपरिशुद्ध इवात्मतन्त्रः॥ २६

śuddhaṃ svadhāmnyuparatākhilabuddhyavasthaṃ

cinmātramekamabhayaṃ pratiṣidhya māyām|

tiṣṭhaṃstayaiva puruṣatvamupetya tasyā-

māste bhavānapariśuddha ivātmatantraḥ|| 26

अर्थ

दक्षने कहा—भगवन्! अपने स्वरूपमें आप बुद्धिकी जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओंसे रहित, शुद्ध, चिन्मय, भेदरहित, अतएव निर्भय हैं। आप मायाका तिरस्कार करके स्वतन्त्ररूपसे विराजमान हैं; तथापि जब मायासे ही जीवभावको स्वीकारकर उसी मायामें स्थित हो जाते हैं, तब अज्ञानी-से दीखने लगते हैं॥ २६॥

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