दक्षप्रजापतिका सिर जल गया है, इसलिये उनके बकरेका सिर लगा दिया जाय; भगदेव मित्रदेवताके नेत्रोंसे अपना यज्ञभाग देखें॥ ३॥✎ 361
प्रजापतेर्दग्धशीर्ष्णो भवत्वजमुखं शिरः।
मित्रस्य चक्षुषेक्षेत भागं स्वं बर्हिषो भगः॥ ३
दक्षप्रजापतिका सिर जल गया है, इसलिये उनके बकरेका सिर लगा दिया जाय; भगदेव मित्रदेवताके नेत्रोंसे अपना यज्ञभाग देखें॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 434) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)