इन्द्रने कहा—अच्युत! आपका यह जगत्को प्रकाशित करनेवाला रूप देवद्रोहियोंका संहार करनेवाली आठ भुजाओंसे सुशोभित है, जिनमें आप सदा ही नाना प्रकारके आयुध धारण किये रहते हैं। यह रूप हमारे मन और नेत्रोंको परम आनन्द देनेवाला है॥ ३२॥
इदमप्यच्युत विश्वभावनं
वपुरानन्दकरं मनोदृशाम्।
सुरविद्विट्क्षपणैरुदायुधै-
र्भुजदण्डैरुपपन्नमष्टभिः ॥ ३२
इन्द्रने कहा—अच्युत! आपका यह जगत्को प्रकाशित करनेवाला रूप देवद्रोहियोंका संहार करनेवाली आठ भुजाओंसे सुशोभित है, जिनमें आप सदा ही नाना प्रकारके आयुध धारण किये रहते हैं। यह रूप हमारे मन और नेत्रोंको परम आनन्द देनेवाला है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 438) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/32/