श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

ऋषय ऊचुः

अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं

यदात्मनाऽऽचरसि हि कर्म नाज्यसे।

विभूतये यत उपसेदुरीश्‍वरीं

न मन्यते स्वयमनुवर्ततीं भवान्॥ ३४

ananvitaṃ te bhagavan viceṣṭitaṃ

yadātmanā''carasi hi karma nājyase|

vibhūtaye yata upasedurīśvarīṃ

na manyate svayamanuvartatīṃ bhavān|| 34

अर्थ

ऋषियोंने कहा—भगवन्! आपकी लीला बड़ी ही अनोखी है; क्योंकि आप कर्म करते हुए भी उनसे निर्लेप रहते हैं। दूसरे लोग वैभवकी भूखसे जिन लक्ष्मीजीकी उपासना करते हैं, वे स्वयं आपकी सेवामें लगी रहती हैं; तो भी आप उनका मान नहीं करते, उनसे निःस्पृह रहते हैं॥ ३४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें