॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.7.34
ऋषय ऊचुः
अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं
यदात्मनाऽऽचरसि हि कर्म नाज्यसे।
विभूतये यत उपसेदुरीश्वरीं
न मन्यते स्वयमनुवर्ततीं भवान्॥ ३४
ananvitaṃ te bhagavan viceṣṭitaṃ
yadātmanā''carasi hi karma nājyase|
vibhūtaye yata upasedurīśvarīṃ
na manyate svayamanuvartatīṃ bhavān|| 34
अर्थ
ऋषियोंने कहा—भगवन्! आपकी लीला बड़ी ही अनोखी है; क्योंकि आप कर्म करते हुए भी उनसे निर्लेप रहते हैं। दूसरे लोग वैभवकी भूखसे जिन लक्ष्मीजीकी उपासना करते हैं, वे स्वयं आपकी सेवामें लगी रहती हैं; तो भी आप उनका मान नहीं करते, उनसे निःस्पृह रहते हैं॥ ३४॥