यजमानपत्नीने कहा—सर्वसमर्थ परमेश्वर! आपका स्वागत है। मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप मुझपर प्रसन्न होइये। लक्ष्मीपते! अपनी प्रिया लक्ष्मीजीके सहित आप हमारी रक्षा कीजिये। यज्ञेश्वर! जिस प्रकार सिरके बिना मनुष्यका धड़ अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार अन्य अंगोंसे पूर्ण होनेपर भी आपके बिना यज्ञकी शोभा नहीं होती॥ ३६॥
स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः
श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः।
त्वामृतेऽधीश नाङ्गैर्मखः शोभते
शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः॥ ३६
यजमानपत्नीने कहा—सर्वसमर्थ परमेश्वर! आपका स्वागत है। मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप मुझपर प्रसन्न होइये। लक्ष्मीपते! अपनी प्रिया लक्ष्मीजीके सहित आप हमारी रक्षा कीजिये। यज्ञेश्वर! जिस प्रकार सिरके बिना मनुष्यका धड़ अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार अन्य अंगोंसे पूर्ण होनेपर भी आपके बिना यज्ञकी शोभा नहीं होती॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 438) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/7/36/