श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.46

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

त्वं पुरा गां रसाया महासूकरो

दंष्ट्रया पद्मिनीं वारणेन्द्रो यथा।

स्तूयमानो नदँल्लीलया योगिभि-

र्व्युज्जहर्थ त्रयीगात्र यज्ञक्रतुः॥ ४६

tvaṃ purā gāṃ rasāyā mahāsūkaro

daṃṣṭrayā padminīṃ vāraṇendro yathā|

stūyamāno nadam̐llīlayā yogibhi-

rvyujjahartha trayīgātra yajñakratuḥ|| 46

अर्थ

वेदमूर्ते! यज्ञ और उसका संकल्प दोनों आप ही हैं। पूर्वकालमें आप ही अति विशाल वराहरूप धारणकर रसातलमें डूबी हुई पृथ्वीको लीलासे ही अपनी दाढ़ोंपर उठाकर इस प्रकार निकाल लाये थे, जैसे कोई गजराज कमलिनीको उठा लाये। उस समय आप धीरे-धीरे गरज रहे थे और योगिगण आपका यह अलौकिक पुरुषार्थ देखकर आपकी स्तुति करते जाते थे॥ ४६॥

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