श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तं निःश्‍वसन्तं स्फुरिताधरोष्ठं

सुनीतिरुत्संग उदूह्य बालम्।

निशम्य तत्पौरमुखान्‍नितान्तं

सा विव्यथे यद्गदितं सपत्न्या॥ १५

taṃ niḥśvasantaṃ sphuritādharoṣṭhaṃ

sunītirutsaṃga udūhya bālam|

niśamya tatpauramukhānnitāntaṃ

sā vivyathe yadgaditaṃ sapatnyā|| 15

अर्थ

उसके दोनों होठ फड़क रहे थे और वह सिसक-सिसककर रो रहा था। सुनीतिने बेटेको गोदमें उठा लिया और जब महलके दूसरे लोगोंसे अपनी सौत सुरुचिकी कही हुई बातें सुनी, तब उसे भी बड़ा दुःख हुआ॥ १५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें