‘बेटा! तू भी उन भक्तवत्सल श्रीभगवान्का ही आश्रय ले। जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटनेकी इच्छा करनेवाले मुमुक्षुलोग निरन्तर उन्हींके चरणकमलोंके मार्गकी खोज किया करते हैं। तू स्वधर्मपालनसे पवित्र हुए अपने चित्तमें श्रीपुरुषोत्तमभगवान्को बैठा ले तथा अन्य सबका चिन्तन छोड़कर केवल उन्हींका भजन कर ॥ २२॥✎ 365366
तमेव वत्साश्रय भृत्यवत्सलं
मुमुक्षुभिर्मृग्यपदाब्जपद्धतिम् ।
अनन्यभावे निजधर्मभाविते
मनस्यवस्थाप्य भजस्व पूरुषम्॥ २२
‘बेटा! तू भी उन भक्तवत्सल श्रीभगवान्का ही आश्रय ले। जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटनेकी इच्छा करनेवाले मुमुक्षुलोग निरन्तर उन्हींके चरणकमलोंके मार्गकी खोज किया करते हैं। तू स्वधर्मपालनसे पवित्र हुए अपने चित्तमें श्रीपुरुषोत्तमभगवान्को बैठा ले तथा अन्य सबका चिन्तन छोड़कर केवल उन्हींका भजन कर ॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 445) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#365 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीपुरुषोत्तमभगवान् को → श्रीपुरुषोत्तमभगवान्को