श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नारदस्तदुपाकर्ण्य ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम्।

स्पृष्ट्वा मूर्धन्यघघ्नेन पाणिना प्राह विस्मितः॥ २५

nāradastadupākarṇya jñātvā tasya cikīrṣitam|

spṛṣṭvā mūrdhanyaghaghnena pāṇinā prāha vismitaḥ|| 25

अर्थ

यह सब समाचार सुनकर और ध्रुव क्या करना चाहता है, इस बातको जानकर नारदजी वहाँ आये। उन्होंने ध्रुवके मस्तकपर अपना पापनाशक कर-कमल फेरते हुए मन-ही-मन विस्मित होकर कहा॥ २५॥

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