यह सब समाचार सुनकर और ध्रुव क्या करना चाहता है, इस बातको जानकर नारदजी वहाँ आये। उन्होंने ध्रुवके मस्तकपर अपना पापनाशक कर-कमल फेरते हुए मन-ही-मन विस्मित होकर कहा॥ २५॥
नारदस्तदुपाकर्ण्य ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम्।
स्पृष्ट्वा मूर्धन्यघघ्नेन पाणिना प्राह विस्मितः॥ २५
यह सब समाचार सुनकर और ध्रुव क्या करना चाहता है, इस बातको जानकर नारदजी वहाँ आये। उन्होंने ध्रुवके मस्तकपर अपना पापनाशक कर-कमल फेरते हुए मन-ही-मन विस्मित होकर कहा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 445) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/25/