॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.36
अथापि मेऽविनीतस्य क्षात्त्रं घोरमुपेयुषः।
सुरुच्या दुर्वचोबाणैर्न भिन्ने श्रयते हृदि॥ ३६
athāpi me'vinītasya kṣāttraṃ ghoramupeyuṣaḥ|
surucyā durvacobāṇairna bhinne śrayate hṛdi|| 36
अर्थ
इसके सिवा, मुझे घोर क्षत्रियस्वभाव प्राप्त हुआ है, अतएव मुझमें विनयका प्रायः अभाव है; सुरुचिने अपने कटुवचनरूपी बाणोंसे मेरे हृदयको विदीर्ण कर डाला है; इसलिये उसमें आपका यह उपदेश नहीं ठहर पाता॥ ३६॥