श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अथापि मेऽविनीतस्य क्षात्त्रं घोरमुपेयुषः।

सुरुच्या दुर्वचोबाणैर्न भिन्‍ने श्रयते हृदि॥ ३६

athāpi me'vinītasya kṣāttraṃ ghoramupeyuṣaḥ|

surucyā durvacobāṇairna bhinne śrayate hṛdi|| 36

अर्थ

इसके सिवा, मुझे घोर क्षत्रियस्वभाव प्राप्त हुआ है, अतएव मुझमें विनयका प्रायः अभाव है; सुरुचिने अपने कटुवचनरूपी बाणोंसे मेरे हृदयको विदीर्ण कर डाला है; इसलिये उसमें आपका यह उपदेश नहीं ठहर पाता॥ ३६॥

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