श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

प्राणायामेन त्रिवृता प्राणेन्द्रियमनोमलम्।

शनैर्व्युदस्याभिध्यायेन्मनसा गुरुणा गुरुम्॥ ४४

prāṇāyāmena trivṛtā prāṇendriyamanomalam|

śanairvyudasyābhidhyāyenmanasā guruṇā gurum|| 44

अर्थ

फिर रेचक, पूरक और कुम्भक—तीन प्रकारके प्राणायामसे धीरे-धीरे प्राण, मन और इन्द्रियके दोषोंको दूरकर धैर्ययुक्त मनसे परमगुरु श्रीभगवान्‌का इस प्रकार ध्यान करना॥ ४४॥

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