फिर रेचक, पूरक और कुम्भक—तीन प्रकारके प्राणायामसे धीरे-धीरे प्राण, मन और इन्द्रियके दोषोंको दूरकर धैर्ययुक्त मनसे परमगुरु श्रीभगवान्का इस प्रकार ध्यान करना॥ ४४॥
प्राणायामेन त्रिवृता प्राणेन्द्रियमनोमलम्।
शनैर्व्युदस्याभिध्यायेन्मनसा गुरुणा गुरुम्॥ ४४
फिर रेचक, पूरक और कुम्भक—तीन प्रकारके प्राणायामसे धीरे-धीरे प्राण, मन और इन्द्रियके दोषोंको दूरकर धैर्ययुक्त मनसे परमगुरु श्रीभगवान्का इस प्रकार ध्यान करना॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 447) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/44/