श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.54

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

‘‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’’।

मन्त्रेणानेन देवस्य कुर्याद् द्रव्यमयीं बुधः।

सपर्यां विविधैर्द्रव्यैर्देशकालविभागवित्॥ ५४

‘‘oṃ namo bhagavate vāsudevāya’’|

mantreṇānena devasya kuryād dravyamayīṃ budhaḥ|

saparyāṃ vividhairdravyairdeśakālavibhāgavit|| 54

अर्थ

राजकुमार! इस ध्यानके साथ जिस परम गुह्य मन्त्रका जप करना चाहिये, वह भी बतलाता हूँ—सुन। इसका सात रात जप करनेसे मनुष्य आकाशमें विचरनेवाले सिद्धोंका दर्शन कर सकता है॥ ५३॥ वह मन्त्र है—‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’। किस देश और किस कालमें कौन वस्तु उपयोगी है—इसका विचार करके बुद्धिमान् पुरुषको इस मन्त्रके द्वारा तरह-तरहकी सामग्रियोंसे भगवान्‌की द्रव्यमयी पूजा करनी चाहिये॥ ५४॥✎ 370

यह व्याख्या श्लोक 4.8.53 से 4.8.54 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #370 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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