प्रभुकी पूजाके लिये जिन-जिन उपचारोंका विधान किया गया है, उन्हें मन्त्रमूर्ति श्रीहरिको द्वादशाक्षर मन्त्रके द्वारा ही अर्पण करे॥ ५८॥✎ 371
परिचर्या भगवतो यावत्यः पूर्वसेविताः।
ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये॥ ५८
प्रभुकी पूजाके लिये जिन-जिन उपचारोंका विधान किया गया है, उन्हें मन्त्रमूर्ति श्रीहरिको द्वादशाक्षर मन्त्रके द्वारा ही अर्पण करे॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 449) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/58/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)