॥ श्रीहरिः ॥
अप्यनाथं वने ब्रह्मन् मास्मादन्त्यर्भकं वृकाः।
श्रान्तं शयानं क्षुधितं परिम्लानमुखाम्बुजम्॥ ६६
apyanāthaṃ vane brahman māsmādantyarbhakaṃ vṛkāḥ|
śrāntaṃ śayānaṃ kṣudhitaṃ parimlānamukhāmbujam|| 66
अर्थ
उसका कमल-सा मुख भूखसे कुम्हला गया होगा, वह थककर कहीं रास्तेमें पड़ गया होगा। ब्रह्मन्! उस असहाय बच्चेको वनमें कहीं भेड़िये न खा जायँ॥ ६६॥
अप्यनाथं वने ब्रह्मन् मास्मादन्त्यर्भकं वृकाः।
श्रान्तं शयानं क्षुधितं परिम्लानमुखाम्बुजम्॥ ६६
उसका कमल-सा मुख भूखसे कुम्हला गया होगा, वह थककर कहीं रास्तेमें पड़ गया होगा। ब्रह्मन्! उस असहाय बच्चेको वनमें कहीं भेड़िये न खा जायँ॥ ६६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.66 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 450) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/66/