॥ श्रीहरिः ॥
चतुर्थमपि वै मासं द्वादशे द्वादशेऽहनि।
वायुभक्षो जितश्वासो ध्यायन्देवमधारयत्॥ ७५
caturthamapi vai māsaṃ dvādaśe dvādaśe'hani|
vāyubhakṣo jitaśvāso dhyāyandevamadhārayat|| 75
अर्थ
चौथे महीनेमें उन्होंने श्वासको जीतकर बारह-बारह दिनके बाद केवल वायु पीकर ध्यानयोगद्वारा भगवान्की आराधना की॥ ७५॥✎ 372 1323
चतुर्थमपि वै मासं द्वादशे द्वादशेऽहनि।
वायुभक्षो जितश्वासो ध्यायन्देवमधारयत्॥ ७५
चौथे महीनेमें उन्होंने श्वासको जीतकर बारह-बारह दिनके बाद केवल वायु पीकर ध्यानयोगद्वारा भगवान्की आराधना की॥ ७५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.75 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 450) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/75/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #372 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #1323 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पवित्रता-पूर्वक → पवित्रतापूर्वक