श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अथ नवमोऽध्यायः

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

मैत्रेय उवाच

त एवमुत्सन्‍नभया उरुक्रमे

कृतावनामाः प्रययुस्त्रिविष्टपम्।

सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता

मधोर्वनं भृत्यदिदृक्षया गतः॥ १

ta evamutsannabhayā urukrame

kṛtāvanāmāḥ prayayustriviṣṭapam|

sahasraśīrṣāpi tato garutmatā

madhorvanaṃ bhṛtyadidṛkṣayā gataḥ|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! भगवान्‌के इस प्रकार आश्वासन देनेसे देवताओंका भय जाता रहा और वे उन्हें प्रणाम करके स्वर्गलोकको चले गये। तदनन्तर विराट्स्वरूप भगवान् गरुड़पर चढ़कर अपने भक्तको देखनेके लिये मधुवनमें आये॥ १॥✎ 374

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #374 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें