श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! भगवान्के इस प्रकार आश्वासन देनेसे देवताओंका भय जाता रहा और वे उन्हें प्रणाम करके स्वर्गलोकको चले गये। तदनन्तर विराट्स्वरूप भगवान् गरुड़पर चढ़कर अपने भक्तको देखनेके लिये मधुवनमें आये॥ १॥✎ 374
त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे
कृतावनामाः प्रययुस्त्रिविष्टपम्।
सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता
मधोर्वनं भृत्यदिदृक्षया गतः॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! भगवान्के इस प्रकार आश्वासन देनेसे देवताओंका भय जाता रहा और वे उन्हें प्रणाम करके स्वर्गलोकको चले गये। तदनन्तर विराट्स्वरूप भगवान् गरुड़पर चढ़कर अपने भक्तको देखनेके लिये मधुवनमें आये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 452) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)