श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसंगो

भूयादनन्त महताममलाशयानाम्।

येनांजसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं

नेष्ये भवद‍्गुणकथामृतपानमत्तः॥ ११

bhaktiṃ muhuḥ pravahatāṃ tvayi me prasaṃgo

bhūyādananta mahatāmamalāśayānām|

yenāṃjasolbaṇamuruvyasanaṃ bhavābdhiṃ

neṣye bhavadguṇakathāmṛtapānamattaḥ|| 11

अर्थ

अनन्त परमात्मन्! मुझे तो आप उन विशुद्धहृदय महात्मा भक्तोंका संग दीजिये, जिनका आपमें अविच्छिन्‍न भक्तिभाव है; उनके संगमें मैं आपके गुणों और लीलाओंकी कथा-सुधाको पी-पीकर उन्मत्त हो जाऊँगा और सहज ही इस अनेक प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण भयंकर संसारसागरके उस पार पहुँच जाऊँगा॥ ११॥

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