॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.15
त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा
कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः।
यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या
द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से॥ १५
tvaṃ nityamuktapariśuddhavibuddha ātmā
kūṭastha ādipuruṣo bhagavāṃstryadhīśaḥ|
yadbuddhyavasthitimakhaṇḍitayā svadṛṣṭyā
draṣṭā sthitāvadhimakho vyatirikta āsse|| 15
अर्थ
प्रभो! आप अपनी अखण्ड चिन्मयी दृष्टिसे बुद्धिकी सभी अवस्थाओंके साक्षी हैं तथा नित्यमुक्त शुद्धसत्त्वमय, सर्वज्ञ, परमात्मस्वरूप, निर्विकार, आदि-पुरुष, षडैश्वर्य-सम्पन्न एवं तीनों गुणोंके अधीश्वर हैं। आप जीवसे सर्वथा भिन्न हैं तथा संसारकी स्थितिके लिये यज्ञाधिष्ठाता विष्णुरूपसे विराजमान हैं॥ १५॥✎ 2003