॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.21
मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम्।
धर्मोऽग्निः कश्यपः शुक्रो मुनयो ये वनौकसः।
चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारकाः॥ २१
meḍhyāṃ gocakravatsthāsnu parastātkalpavāsinām|
dharmo'gniḥ kaśyapaḥ śukro munayo ye vanaukasaḥ|
caranti dakṣiṇīkṛtya bhramanto yatsatārakāḥ|| 21
अर्थ
भद्र! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागणरूप ज्योतिश्चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता रहता है जिस प्रकार मेढीके* चारों ओर दँवरीके बैल घूमते रहते हैं। अवान्तर कल्पपर्यन्त रहनेवाले अन्य लोकोंका नाश हो जानेपर भी जो स्थिर रहता है तथा तारागणके सहित धर्म, अग्नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र एवं सप्तर्षिगण जिसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, वह ध्रुवलोक मैं तुझे देता हूँ॥ २०-२१॥
टिप्पणियाँ
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कटी हुई फसल धान-गेहूँ आदिको कुचलनेके लिये घुमाये जानेवाले बैल जिस खंभेमें बँधे रहते हैं, उसका नाम मेढी है।