इससे तू अन्तमें सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और सप्तर्षियोंसे भी ऊपर मेरे निज धामको जायगा, जहाँ पहुँच जानेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना होता है॥ २५॥
ततो गन्तासि मत्स्थानं सर्वलोकनमस्कृतम्।
उपरिष्टादृषिभ्यस्त्वं यतो नावर्तते गतः॥ २५
इससे तू अन्तमें सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और सप्तर्षियोंसे भी ऊपर मेरे निज धामको जायगा, जहाँ पहुँच जानेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना होता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 455) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/25/