श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

विदुर उवाच

सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे-

र्मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम् ।

लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना

कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित्॥ २८

sudurlabhaṃ yatparamaṃ padaṃ hare-

rmāyāvinastaccaraṇārcanārjitam |

labdhvāpyasiddhārthamivaikajanmanā

kathaṃ svamātmānamamanyatārthavit|| 28

अर्थ

विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन्! मायापति श्रीहरिका परमपद तो अत्यन्त दुर्लभ है और मिलता भी उनके चरणकमलोंकी उपासनासे ही है। ध्रुवजी भी सारासारका पूर्ण विवेक रखते थे; फिर एक ही जन्ममें उस परमपदको पा लेनेपर भी उन्होंने अपनेको अकृतार्थ क्यों समझा?॥ २८॥

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