श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

मयैतत्प्रार्थितं व्यर्थं चिकित्सेव गतायुषि।

प्रसाद्य जगदात्मानं तपसा दुष्प्रसादनम्।

भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः॥ ३४

mayaitatprārthitaṃ vyarthaṃ cikitseva gatāyuṣi|

prasādya jagadātmānaṃ tapasā duṣprasādanam|

bhavacchidamayāce'haṃ bhavaṃ bhāgyavivarjitaḥ|| 34

अर्थ

जिन्हें प्रसन्‍न करना अत्यन्त कठिन है; उन्हीं विश्वात्मा श्रीहरिको तपस्याद्वारा प्रसन्‍न करके मैंने जो कुछ माँगा है, वह सब व्यर्थ है; ठीक उसी तरह, जैसे गतायु पुरुषके लिये चिकित्सा व्यर्थ होती है। ओह! मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले प्रभुसे मैंने संसार ही माँगा॥ ३४॥✎ 377 1598

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #377 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1598 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तपस्या-द्वारा → तपस्याद्वारा

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