श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—तात! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्दपादारविन्द-मकरन्दके ही मधुकर हैं—जो निरन्तर प्रभुकी चरण-रजका ही सेवन करते हैं और जिनका मन अपने-आप आयी हुई सभी परिस्थितियोंमें सन्तुष्ट रहता है, वे भगवान्से उनकी सेवाके सिवा अपने लिये और कोई भी पदार्थ नहीं माँगते॥ ३६॥✎ 378
न वै मुकुन्दस्य पदारविन्दयो
रजोजुषस्तात भवादृशा जनाः।
वाञ्छन्ति तद्दास्यमृतेऽर्थमात्मनो
यदृच्छया लब्धमनःसमृद्धयः॥ ३६
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—तात! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्दपादारविन्द-मकरन्दके ही मधुकर हैं—जो निरन्तर प्रभुकी चरण-रजका ही सेवन करते हैं और जिनका मन अपने-आप आयी हुई सभी परिस्थितियोंमें सन्तुष्ट रहता है, वे भगवान्से उनकी सेवाके सिवा अपने लिये और कोई भी पदार्थ नहीं माँगते॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 457) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/9/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)