॥ श्रीहरिः ॥
अभिव२न्द्य पितुः पादावाशीर्भिश्चाभि३मन्त्रितः।
ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः॥ ४५
abhivandya pituḥ pādāvāśīrbhiścābhimantritaḥ|
nanāma mātarau śīrṣṇā satkṛtaḥ sajjanāgraṇīḥ|| 45
अर्थ
तदनन्तर सज्जनोंमें अग्रगण्य ध्रुवजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर, कुशल-प्रश्नादिसे सम्मानित हो दोनों माताओंको प्रणाम किया॥ ४५॥✎ 1962
अभिवन्द्य पितुः पादावाशीर्भिश्चाभिमन्त्रितः।
ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः॥ ४५
तदनन्तर सज्जनोंमें अग्रगण्य ध्रुवजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर, कुशल-प्रश्नादिसे सम्मानित हो दोनों माताओंको प्रणाम किया॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 458) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/45/टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—वाद्य।
(मुद्रित पृष्ठ 458) - ३
प्रा० पा०—चानुम०।
(मुद्रित पृष्ठ 458)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी