ध्रुवकी माता सुनीति अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको गले लगाकर सारा सन्ताप भूल गयी। उसके सुकुमार अंगोंके स्पर्शसे उसे बड़ा ही आनन्द प्राप्त हुआ॥ ४९॥✎ 1962
सुनीतिरस्य जननी प्राणेभ्योऽपि प्रियं सुतम्।
उपगुह्य जहावाधिं तदंगस्पर्शनिर्वृता॥ ४९
ध्रुवकी माता सुनीति अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको गले लगाकर सारा सन्ताप भूल गयी। उसके सुकुमार अंगोंके स्पर्शसे उसे बड़ा ही आनन्द प्राप्त हुआ॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 458) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी