श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्‍वं

सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्‍नः।

तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं

विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो॥ ८

tvaddattayā vayunayedamacaṣṭa viśvaṃ

suptaprabuddha iva nātha bhavatprapannaḥ|

tasyāpavargyaśaraṇaṃ tava pādamūlaṃ

vismaryate kṛtavidā kathamārtabandho|| 8

अर्थ

नाथ! सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्माजीने भी आपकी शरण लेकर आपके दिये हुए ज्ञानके प्रभावसे ही इस जगत‍्को सोकर उठे हुए पुरुषके समान देखा था। दीनबन्धो! उन्हीं आपके चरणतलका मुक्त पुरुष भी आश्रय लेते हैं, कोई भी कृतज्ञ पुरुष उन्हें कैसे भूल सकता है?॥ ८॥

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