श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.38

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

परदेवताप्रसादाधिगतात्मप्रत्यवमर्शेनानुप्रवृत्तेभ्यः पुत्रेभ्य इमां यथादायं विभज्य भुक्तभोगां च महिषीं मृतकमिव सह महाविभूतिमपहाय स्वयं निहितनिर्वेदो हृदि गृहीतहरिविहारानुभावो भगवतो नारदस्य पदवीं पुनरेवानुससार॥ ३८॥

paradevatāprasādādhigatātmapratyavamarśenānupravṛttebhyaḥ putrebhya imāṃ yathādāyaṃ vibhajya bhuktabhogāṃ ca mahiṣīṃ mṛtakamiva saha mahāvibhūtimapahāya svayaṃ nihitanirvedo hṛdi gṛhītaharivihārānubhāvo bhagavato nāradasya padavīṃ punarevānusasāra|| 38||

अर्थ

परमाराध्य श्रीहरिकी कृपासे उनकी विवेकवृत्ति जाग्रत् हो गयी। उन्होंने यह सारी पृथ्वी यथायोग्य अपने अनुगत पुत्रोंको बाँट दी और जिसके साथ उन्होंने तरह-तरहके भोग भोगे थे, उस अपनी राजरानीको साम्राज्यलक्ष्मीके सहित मृतदेहके समान छोड़ दिया तथा हृदयमें वैराग्य धारणकर भगवान्‌की लीलाओंका चिन्तन करते हुए उसके प्रभावसे श्रीनारदजीके बतलाये हुए मार्गका पुनः अनुसरण करने लगे॥ ३८॥✎ 435

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #435 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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