॥ श्रीहरिः ॥
तस्य ह वा एते श्लोकाः—
प्रियव्रतकृतं कर्म को नु कुर्याद्विनेश्वरम्।
यो नेमिनिम्नैरकरोच्छायां घ्नन् सप्त वारिधीन्॥ ३९
tasya ha vā ete ślokāḥ—
priyavratakṛtaṃ karma ko nu kuryādvineśvaram|
yo neminimnairakarocchāyāṃ ghnan sapta vāridhīn|| 39
अर्थ
महाराज प्रियव्रतके विषयमें निम्नलिखित लोकोक्ति प्रसिद्ध है—
यह व्याख्या श्लोक 5.1.39 से 5.1.41 तककी एक साथ है।
तस्य ह वा एते श्लोकाः—
प्रियव्रतकृतं कर्म को नु कुर्याद्विनेश्वरम्।
यो नेमिनिम्नैरकरोच्छायां घ्नन् सप्त वारिधीन्॥ ३९
महाराज प्रियव्रतके विषयमें निम्नलिखित लोकोक्ति प्रसिद्ध है—
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.1.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 582) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/1/39/