श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.41

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

भौमं दिव्यं मानुषं च महित्वं कर्मयोगजम्।

यश्‍चक्रे निरयौपम्यं पुरुषानुजनप्रियः॥ ४१

bhaumaṃ divyaṃ mānuṣaṃ ca mahitvaṃ karmayogajam|

yaścakre nirayaupamyaṃ puruṣānujanapriyaḥ|| 41

अर्थ

महाराज प्रियव्रतके विषयमें निम्नलिखित लोकोक्ति प्रसिद्ध है—

यह व्याख्या श्लोक 5.1.39 से 5.1.41 तककी एक साथ है।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे प्रियव्रतविजये प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

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