श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कस्त्वं निगूढश्‍चरसि द्विजानां

बिभर्षि सूत्रं कतमोऽवधूतः।

कस्यासि कुत्रत्य इहापि कस्मात्

क्षेमाय नश्चेदसि नोत शुक्लः॥ १६

kastvaṃ nigūḍhaścarasi dvijānāṃ

bibharṣi sūtraṃ katamo'vadhūtaḥ|

kasyāsi kutratya ihāpi kasmāt

kṣemāya naścedasi nota śuklaḥ|| 16

अर्थ

‘देव! आपने द्विजोंका चिह्न यज्ञोपवीत धारण कर रखा है, बतलाइये इस प्रकार प्रच्छन्‍नभावसे विचरनेवाले आप कौन हैं? क्या आप दत्तात्रेय आदि अवधूतोंमेंसे कोई हैं? आप किसके पुत्र हैं, आपका कहाँ जन्म हुआ है और यहाँ कैसे आपका पदार्पण हुआ है? यदि आप हमारा कल्याण करने पधारे हैं, तो क्या आप साक्षात् सत्त्वमूर्ति भगवान् कपिलजी ही तो नहीं हैं?॥ १६॥

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