॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.10.17
नाहं विशङ्के सुरराजवज्रा-
न्न त्र्यक्षशूलान्न यमस्य दण्डात्।
नाग्न्यर्कसोमानिलवित्तपास्त्रा-
च्छङ्के भृशं ब्रह्मकुलावमानात्॥ १७
nāhaṃ viśaṅke surarājavajrā-
nna tryakṣaśūlānna yamasya daṇḍāt|
nāgnyarkasomānilavittapāstrā-
cchaṅke bhṛśaṃ brahmakulāvamānāt|| 17
अर्थ
मुझे इन्द्रके वज्रका कोई डर नहीं है, न मैं महादेवजीके त्रिशूलसे डरता हूँ और न यमराजके दण्डसे। मुझे अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु और कुबेरके अस्त्र-शस्त्रोंका भी कोई भय नहीं है; परन्तु मैं ब्राह्मणकुलके अपमानसे बहुत ही डरता हूँ॥ १७॥