श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.22

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स्थाल्यग्‍नितापात्पयसोऽभिताप-

स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धिः ।

देहेन्द्रियास्वाशयसन्‍निकर्षात्

तत्संसृतिः पुरुषस्यानुरोधात्॥ २२

sthālyagnitāpātpayaso'bhitāpa-

stattāpatastaṇḍulagarbharandhiḥ |

dehendriyāsvāśayasannikarṣāt

tatsaṃsṛtiḥ puruṣasyānurodhāt|| 22

अर्थ

(देहादिके धर्मोंका आत्मापर कोई प्रभाव ही नहीं होता, ऐसी बात भी नहीं है) चूल्हेपर रखी हुई बटलोई जब अग्‍निसे तपने लगती है, तब उसका जल भी खौलने लगता है और फिर उस जलसे चावलका भीतरी भाग भी पक जाता है। इसी प्रकार अपनी उपाधिके धर्मोंका अनुवर्तन करनेके कारण देह, इन्द्रिय, प्राण और मनकी सन्‍निधिसे आत्माको भी उनके धर्म श्रमादिका अनुभव होता ही है॥ २२॥✎ 447

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #447 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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