॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.10.23
शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानां
यः किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम्।
स्वधर्ममाराधनमच्युतस्य
यदीहमानो विजहात्यघौघम्॥ २३
śāstābhigoptā nṛpatiḥ prajānāṃ
yaḥ kiṅkaro vai na pinaṣṭi piṣṭam|
svadharmamārādhanamacyutasya
yadīhamāno vijahātyaghaugham|| 23
अर्थ
आपने जो दण्डादिकी व्यर्थता बतायी, सो राजा तो प्रजाका शासन और पालन करनेके लिये नियुक्त किया हुआ उसका दास ही है। उसका उन्मत्तादिको दण्ड देना पिसे हुएको पीसनेके समान व्यर्थ नहीं हो सकता; क्योंकि अपने धर्मका आचरण करना भगवान्की सेवा ही है, उसे करनेवाला व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण पापराशिको नष्ट कर देता है॥ २३॥✎ 447