अथ त ईश्वरवचः सोपालम्भमुपाकर्ण्योपायतुरीयाच्छङ्कितमनसस्तं विज्ञापयाम्बभूवुः॥ ३॥ न वयं नरदेव प्रमत्ता भवन्नियमानुपथाः साध्वेव वहामः। अयमधुनैव नियुक्तोऽपि न द्रुतं व्रजति नानेन सह वोढुमु ह वयं पारयाम इति॥ ४॥
atha ta īśvaravacaḥ sopālambhamupākarṇyopāyaturīyācchaṅkitamanasastaṃ vijñāpayāmbabhūvuḥ|| 3||
अर्थ
तब अपने स्वामीका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर कहारोंको डर लगा कि कहीं राजा उन्हें दण्ड न दें। इसलिये उन्होंने राजासे इस प्रकार निवेदन किया॥ ३॥
अथ त ईश्वरवचः सोपालम्भमुपाकर्ण्योपायतुरीयाच्छङ्कितमनसस्तं विज्ञापयाम्बभूवुः॥ ३॥
तब अपने स्वामीका यह आक्षेपयुक्त वचन सुनकर कहारोंको डर लगा कि कहीं राजा उन्हें दण्ड न दें। इसलिये उन्होंने राजासे इस प्रकार निवेदन किया॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.10.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 616) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/10/3/