श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अथ त ईश्‍वरवचः सोपालम्भमुपाकर्ण्योपायतुरीयाच्छङ्कितमनसस्तं विज्ञापयाम्बभूवुः॥ ३॥ न वयं नरदेव प्रमत्ता भवन्‍नियमानुपथाः साध्वेव वहामः। अयमधुनैव नियुक्तोऽपि न द्रुतं व्रजति नानेन सह वोढुमु ह वयं पारयाम इति॥ ४॥

na vayaṃ naradeva pramattā bhavanniyamānupathāḥ sādhveva vahāmaḥ| ayamadhunaiva niyukto'pi na drutaṃ vrajati nānena saha voḍhumu ha vayaṃ pārayāma iti|| 4||

अर्थ

‘महाराज! यह हमारा प्रमाद नहीं है, हम आपकी नियममर्यादाके अनुसार ठीक-ठीक ही पालकी ले चल रहे हैं। यह एक नया कहार अभी-अभी पालकीमें लगाया गया है, तो भी यह जल्दी-जल्दी नहीं चलता। हमलोग इसके साथ पालकी नहीं ले जा सकते’॥ ४॥

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