श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

द्रुमेषु रंस्यन् सुतदारवत्सलो

व्यवायदीनो विवशः स्वबन्धने।

क्‍वचित्प्रमादाद्गिरिकन्दरे पतन्

वल्लीं गृहीत्वा गजभीत आस्थितः॥ १८

drumeṣu raṃsyan sutadāravatsalo

vyavāyadīno vivaśaḥ svabandhane|

kvacitpramādādgirikandare patan

vallīṃ gṛhītvā gajabhīta āsthitaḥ|| 18

अर्थ

वहाँ वृक्षोंमें क्रीडा करता हुआ पुत्र और स्त्रीके स्नेहपाशमें बँध जाता है। इसमें मैथुनकी वासना इतनी बढ़ जाती है कि तरह-तरहके दुर्व्यवहारोंसे दीन होनेपर भी यह विवश होकर अपने बन्धनको तोड़नेका साहस नहीं कर सकता। कभी असावधानीसे पर्वतकी गुफामें गिरने लगता है तो उसमें रहनेवाले हाथीसे डरकर किसी लताके सहारे लटका रहता है॥ १८॥

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