श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अतः कथञ्चित्स विमुक्त आपदः ✎ 1054

पुनश्‍च सार्थं प्रविशत्यरिन्दम।

अध्वन्यमुष्मिन्‍नजया२ निवेशितो

भ्रमञ्जनोऽद्यापि न वेद कश्‍चन॥ १९

ataḥ kathañcitsa vimukta āpadaḥ

punaśca sārthaṃ praviśatyarindama|

adhvanyamuṣminnajayā niveśito

bhramañjano'dyāpi na veda kaścana|| 19

अर्थ

शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस आपत्तिसे छुटकारा मिल जाता है, तो यह फिर अपने गोलमें मिल जाता है। जो मनुष्य मायाकी प्रेरणासे एक बार इस मार्गमें पहुँच जाता है, उसे भटकते-भटकते अन्ततक अपने परम पुरुषार्थका पता नहीं लगता॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मुष्मिन्‍नंजसा।

    (मुद्रित पृष्ठ 628)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1054 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कथंञ्च‌ित्स → कथञ्चित्स

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें