राजा रहूगणने कहा—अहो! समस्त योनियोंमें यह मनुष्यजन्म ही श्रेष्ठ है। अन्यान्य लोकोंमें प्राप्त होनेवाले देवादि उत्कृष्ट जन्मोंसे भी क्या लाभ है, जहाँ भगवान् हृषीकेशके पवित्र यशसे शुद्ध अन्तःकरणवाले आप-जैसे महात्माओंका अधिकाधिक समागम नहीं मिलता॥ २१॥
अहो नृजन्माखिलजन्मशोभनं
किं जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन्।
न यद्धृषीकेशयशःकृतात्मनां
महात्मनां वः प्रचुरः समागमः॥ २१
राजा रहूगणने कहा—अहो! समस्त योनियोंमें यह मनुष्यजन्म ही श्रेष्ठ है। अन्यान्य लोकोंमें प्राप्त होनेवाले देवादि उत्कृष्ट जन्मोंसे भी क्या लाभ है, जहाँ भगवान् हृषीकेशके पवित्र यशसे शुद्ध अन्तःकरणवाले आप-जैसे महात्माओंका अधिकाधिक समागम नहीं मिलता॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.13.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 629) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/13/21/