श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.22

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

न ह्यद्भुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभि-

र्हतांहसो भक्तिरधोक्षजेऽमला।

मौहूर्तिकाद्यस्य समागमाच्च मे

दुस्तर्कमूलोऽपहतोऽविवेकः ॥ २२

na hyadbhutaṃ tvaccaraṇābjareṇubhi-

rhatāṃhaso bhaktiradhokṣaje'malā|

mauhūrtikādyasya samāgamācca me

dustarkamūlo'pahato'vivekaḥ || 22

अर्थ

आपके चरणकमलोंकी रजका सेवन करनेसे जिनके सारे पाप-ताप नष्ट हो गये हैं, उन महानुभावोंको भगवान्‌की विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है। मेरा तो आपके दो घड़ीके सत्संगसे ही सारा कुतर्कमूलक अज्ञान नष्ट हो गया है॥ २२॥✎ 452

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #452 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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