॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.13.6
क्वचिद्वितोयाः सरितोऽभियाति
परस्परं चालषते निरन्धः।
आसाद्य दावं क्वचिदग्नितप्तो
निर्विद्यते क्व च यक्षैर्हृतासुः॥ ६
kvacidvitoyāḥ sarito'bhiyāti
parasparaṃ cālaṣate nirandhaḥ|
āsādya dāvaṃ kvacidagnitapto
nirvidyate kva ca yakṣairhṛtāsuḥ|| 6
अर्थ
कभी जलहीन नदियोंकी ओर जाता है, कभी अन्न न मिलनेपर आपसमें एक-दूसरेसे भोजनप्राप्तिकी इच्छा करता है, कभी दावानलमें घुसकर अग्निसे झुलस जाता है और कभी यक्षलोग इसके प्राण खींचने लगते हैं तो यह खिन्न होने लगता है॥ ६॥