श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

शूरैर्हृतस्वः क्‍व च निर्विण्णचेताः

शोचन् विमुह्यन्‍नुपयाति कश्मलम्।

क्‍वचिच्च गन्धर्वपुरं प्रविष्टः

प्रमोदते निर्वृतवन्मुहूर्तम्॥ ७

śūrairhṛtasvaḥ kva ca nirviṇṇacetāḥ

śocan vimuhyannupayāti kaśmalam|

kvacicca gandharvapuraṃ praviṣṭaḥ

pramodate nirvṛtavanmuhūrtam|| 7

अर्थ

कभी अपनेसे अधिक बलवान्लोग इसका धन छीन लेते हैं, तो यह दुःखी होकर शोक और मोहसे अचेत हो जाता है और कभी गन्धर्वनगरमें पहुँचकर घड़ीभरके लिये सब दुःख भूलकर खुशी मनाने लगता है॥ ७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें