श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.27

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अध्वन्यमुष्मिन्‍निम उपसर्गास्तथा सुखदुःखरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोकमोहलोभमात्सर्येर्ष्यावमानक्षुत्पिपासाधिव्याधिजन्मजरामरणादयः ॥ २७॥✎ 944

adhvanyamuṣminnima upasargāstathā sukhaduḥkharāgadveṣabhayābhimānapramādonmādaśokamohalobhamātsaryerṣyāvamānakṣutpipāsādhivyādhijanmajarāmaraṇādayaḥ || 27||

अर्थ

राजन्! इस मार्गमें पूर्वोक्त विघ्नोंके अतिरिक्त सुख-दुःख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, मात्सर्य, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा-पिपासा, आधि-व्याधि, जन्म, जरा और मृत्यु आदि और भी अनेकों विघ्न हैं॥ २७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #944 शब्दोंके बीचका स्थान: सुखदु:खरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोकमोहलोभमात्सर्ये र्ष्यावमानक्षुत्पिपासाधिव्याधिजन्मजरामरणादय: → सुखदुःखरागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोकमोहलोभमात्सर्येर्ष्यावमानक्षुत्पिपासाधिव्याधिजन्मजरामरणादयः

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